Tuesday, March 1, 2011

इस उदास सुबह की खूबसूरती तुम्हे कैसे दिखलाऊ

घूंघट में  बैठी  दुल्हन  को  जब  घर  की  याद  सताती  है 
जब  भूखे  बच्चे  को  माँ  लोरी  गा  के  बहलाती  है
जब  हँसते  हँसते  जाने  क्यूँ  आँखें  यूँ  ही  भर  आती  है
उस  पल  मुझसे  पूछो  तो  शायद  मैं  बतला  भी  पाऊ 

इस उदास सुबह की खूबसूरती तुम्हे कैसे दिखलाऊ

मैं  खुश  हु  ये  कह  के  भी  जब  अपनी  ख़ुशी  नहीं  दिखला  पाता
तेरी  ग़मगीन  आँखें  मुझे  बेकल  बनाती  है ,
            जब  ये  भी  नहीं  समझा  पाता
जब  मेरे  पहलु से  उठ  कर  चले  जाते  हो  तुम , दो  पल  को  भी
तुम  लौट  आओगी , यह  कह  के  भी  खुद  को  नहीं  बहला  पाता
अब  तुम  ही  बताओ , तुम्हे  इस  बात  के  लिए  कैसे  मनावाऊ 

इस उदास सुबह की खूबसूरती तुम्हे कैसे दिखलाऊ