इस उदास सुबह की खूबसूरती तुम्हे कैसे दिखलाऊ
घूंघट में बैठी दुल्हन को जब घर की याद सताती है
जब भूखे बच्चे को माँ लोरी गा के बहलाती है
जब हँसते हँसते जाने क्यूँ आँखें यूँ ही भर आती है
उस पल मुझसे पूछो तो शायद मैं बतला भी पाऊ
इस उदास सुबह की खूबसूरती तुम्हे कैसे दिखलाऊ
मैं खुश हु ये कह के भी जब अपनी ख़ुशी नहीं दिखला पाता
तेरी ग़मगीन आँखें मुझे बेकल बनाती है ,
जब ये भी नहीं समझा पाता
जब मेरे पहलु से उठ कर चले जाते हो तुम , दो पल को भी
तुम लौट आओगी , यह कह के भी खुद को नहीं बहला पाता
अब तुम ही बताओ , तुम्हे इस बात के लिए कैसे मनावाऊ