Wednesday, October 5, 2011

Suraj aur taare ka farq

"क्या  आप  बाबा  को  ढूंढ़  रहे  हैं ?"

खयालो  के  सभी  धागे  अचानक  से  टूट  गए 
जो  आसमान  के  जानिब  मानो  सदियों  से  देखते  हुए  सोच  रहा  था .
चौंक  कर  पीछे  देखा  
बेटा  पीछे  खडा  था ; सहमा  हुआ 
ऐसा  लगता  था  कि  ना  जाने  कब  से  पूछना  चाहता  था  ये  मुझसे  
पर  एक  झिझक  कि  दीवार  तोड़  नहीं  पा  रहा  था 
पर  शायद  उत्सुकता  ने  भय  पे   विजय  पा  ली  थी 
साहस  कर  के  फिर  से  उसने 
वही  प्रश्न  दोहराया .
"क्या  आप  बाबा  को  ढूंढ़  रहे  हैं ?"

मेरे  आँखों  से  झांकते  सवालों  को  देख  कर  
शायद  मेरी  मदद  करने  की  कोशिश  करते  हुए ; उसने  कहा 
"लोग  मर  कर  तारे  बन  जाते  हैं  न !"

उसकी  ये  बात  सुनकर  छलकते  आँखों  पे  भी  हंसी  तैर  गयी 
जैसे  शब् -ए -चाँदनी  में  झील  में  चाँद  दिखता  हो 

मुस्कुरा  कर  सर  हिलाते  हुए  उसके  दोनों  सवालों  का  जवाब  दे  दिया, 
बिना एक शब्द कहे हुए  

वो  अब  भी  सहमा  हुआ  था , 
पर  शायद  मेरी  हसी  कायम  रखने  के  लिए  ही 
फिर  से  सवाल  किया  उसने 
"इनमे  से  कौन  सा  तारा  बाबा  हैं ?"

फिर  से  एक  मौत  सी  ठंडी  हकीक़त  का  टुकड़ा 
गले  में  आ  के  फंस  गया 
बेटे  की  तरफ  पीठ  कर  के , आसमान  की  ओर  देखते  हुए  सोचने  लगा :
मैं  भी  वही  ढूंढ़  रहा  हु  बेटा 
इंतज़ार  में  हु  कि  जब  कोई  तारा  मुझसे  नज़रे  मिलाएगा 
और  मुस्कुरा  देगा  मेरी  जानिब  देख  के 
एक  आँख  मार  कर  के  बोलेगा - 
क्यूँ  बच्चू , अब  कैसा  लग  रहा  है  वह़ा  ,
मेरे  बिना ...
पहचान  लूँगा  मैं  उन्हें  तब ...

मेरी  कशमकश  देख  कर , उसने  खुद  ही  एक  तारा  चुन  लिया 
सबसे  ज्यादा  चमकता  हुआ  एक  तारा 
और  कहा : "ये  रहे  मेरे  बाबा "

और  मैं  अब  भी  खयालो  के  जंगलो  में  भटकता  सोच  रहा  हु 
बाबा , तुम  तो  मेरे  सूरज  थे ...
हमेशा  सही  रास्ता  दिखलाते  हुए 
सफ़र  पार करने  के  लिए  रौशनी  का  अलाव  हाथ  पे  रख  देते  थे 
अंधेरो  का  साया  भी  नहीं  पड़ने  दिया  कभी 

अब  कैसे  समझाऊं   खुद  को  
कि  वो  आफताब  जो  कल  तक  मेरे  माथे  पे  जगमगाता  था 
आज  एक  तारा  बन  के  दूर  से  ही  मुस्कुरा  रहा  है 

उसी  वक़्त  एक  आवाज़  आई ..
उस  तारे  ने  Telepathy से  मुझसे  बात  करी  हो  जैसे 
"क्यों  परेशान  हो .. 
सूरज  भी  तो  एक  तारा  ही  है 
फर्क  तो  बस  फासलों  का  ही  है  सूरज  और  तारे  में ...
वो  भी  जब  दिल  के  unit में  नापो , 
तो  शायद  बहुत  कम  ही  निकले !!!"

Saturday, October 1, 2011

Ise suljha do...

"अरे, तुम्हारे  हाथो  की  लकीरें  तो  बहुत  उलझी  हुई  हैं !"
मेरे  हाथो  से  खेलना  बंद  कर  के  वो  मुझे  देख  रही  थी 
एकटक , परेशान  हो  के ...
जैसे  मैंने  उससे  फिर  से  कोई  बात  छुपा  ली  है , हर  बार  की  तरह !!!
मैं  कुछ  सिमट  सा  गया  अपने  में ... 
जैसे  उन  लकीरों  को  खुद  ही  बनाया  हो  मैंने , उसे  सताने  के  लिए . 

पर  वो  मुझे  अब  भी  देख  रही  थी 
किसी  जवाब  की  उम्मीद  में  शायद ...

जवाब  में  मैंने  कहा : "सुलझा  दो  इसे ..."
मुझे  लगा  था  की  वो  हंस  के  कहेगी : 
"ऐसा  कभी  होता  है  बुद्धू ?"

पर  एक  शैतानी  सी  दिखी  उसके  चेहरे  पे  मुझे , 
जिसने  उसके  परेशानी  वाला  चेहरा  छुपा  लिया 

यूँ  ही  अँगुलियों  को  मेरे  हाथ  पर  फिरा  दिया ...
और  कहा ...
"लो  सब  सुलझ  गया "
और  फिर  मुस्कुराने  लगी ...

वो  फिर  से मेरे  हाथो  से  खेलने  लगी  है .
मुझसे  बेखबर  हो  के ....
फिर  से  एक  बार ...

और  मैं  ये  सोच  रहा  हु ...

कैसे  हर  बार  तुम , 
मेरी  उलझने  ढूंढ़  लेती  हो , 
और  सुलझा  भी  देती  हो  चुटकियों  में 
जैसे  पाचवी  क्लास  का  स्टुडेंट  
दुसरे  क्लास  का  maths  बना  रहा  हो   
:)