Saturday, October 1, 2011

Ise suljha do...

"अरे, तुम्हारे  हाथो  की  लकीरें  तो  बहुत  उलझी  हुई  हैं !"
मेरे  हाथो  से  खेलना  बंद  कर  के  वो  मुझे  देख  रही  थी 
एकटक , परेशान  हो  के ...
जैसे  मैंने  उससे  फिर  से  कोई  बात  छुपा  ली  है , हर  बार  की  तरह !!!
मैं  कुछ  सिमट  सा  गया  अपने  में ... 
जैसे  उन  लकीरों  को  खुद  ही  बनाया  हो  मैंने , उसे  सताने  के  लिए . 

पर  वो  मुझे  अब  भी  देख  रही  थी 
किसी  जवाब  की  उम्मीद  में  शायद ...

जवाब  में  मैंने  कहा : "सुलझा  दो  इसे ..."
मुझे  लगा  था  की  वो  हंस  के  कहेगी : 
"ऐसा  कभी  होता  है  बुद्धू ?"

पर  एक  शैतानी  सी  दिखी  उसके  चेहरे  पे  मुझे , 
जिसने  उसके  परेशानी  वाला  चेहरा  छुपा  लिया 

यूँ  ही  अँगुलियों  को  मेरे  हाथ  पर  फिरा  दिया ...
और  कहा ...
"लो  सब  सुलझ  गया "
और  फिर  मुस्कुराने  लगी ...

वो  फिर  से मेरे  हाथो  से  खेलने  लगी  है .
मुझसे  बेखबर  हो  के ....
फिर  से  एक  बार ...

और  मैं  ये  सोच  रहा  हु ...

कैसे  हर  बार  तुम , 
मेरी  उलझने  ढूंढ़  लेती  हो , 
और  सुलझा  भी  देती  हो  चुटकियों  में 
जैसे  पाचवी  क्लास  का  स्टुडेंट  
दुसरे  क्लास  का  maths  बना  रहा  हो   
:) 

1 comment:

  1. Waah... kuchh bhav to amazing the...
    मैं कुछ सिमट सा गया अपने में ...
    जैसे उन लकीरों को खुद ही बनाया हो मैंने , उसे सताने के लिए .

    Aur ye : लो सब सुलझ गया

    ReplyDelete