"अरे, तुम्हारे हाथो की लकीरें तो बहुत उलझी हुई हैं !"
मेरे हाथो से खेलना बंद कर के वो मुझे देख रही थी
एकटक , परेशान हो के ...
जैसे मैंने उससे फिर से कोई बात छुपा ली है , हर बार की तरह !!!
मैं कुछ सिमट सा गया अपने में ...
जैसे उन लकीरों को खुद ही बनाया हो मैंने , उसे सताने के लिए .
पर वो मुझे अब भी देख रही थी
किसी जवाब की उम्मीद में शायद ...
जवाब में मैंने कहा : "सुलझा दो इसे ..."
मुझे लगा था की वो हंस के कहेगी :
"ऐसा कभी होता है बुद्धू ?"
पर एक शैतानी सी दिखी उसके चेहरे पे मुझे ,
जिसने उसके परेशानी वाला चेहरा छुपा लिया
यूँ ही अँगुलियों को मेरे हाथ पर फिरा दिया ...
और कहा ...
"लो सब सुलझ गया "
और फिर मुस्कुराने लगी ...
वो फिर से मेरे हाथो से खेलने लगी है .
मुझसे बेखबर हो के ....
फिर से एक बार ...
और मैं ये सोच रहा हु ...
कैसे हर बार तुम ,
मेरी उलझने ढूंढ़ लेती हो ,
और सुलझा भी देती हो चुटकियों में
जैसे पाचवी क्लास का स्टुडेंट
दुसरे क्लास का maths बना रहा हो
:)
Waah... kuchh bhav to amazing the...
ReplyDeleteमैं कुछ सिमट सा गया अपने में ...
जैसे उन लकीरों को खुद ही बनाया हो मैंने , उसे सताने के लिए .
Aur ye : लो सब सुलझ गया